आंगनबाड़ी सेविका चयन में प्रमाणपत्रों की जांच पर उठ रहें हैं सवाल, आखिर उपायुक्त कार्यालय तक क्यों पहुंच रहा विवाद? कहीं फर्जी-एडिटेड सर्टिफिकेट का खेल तो कारण नहीं?

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सरायकेला (गुलाम रब्बानी): सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में चल रही आंगनबाड़ी सेविका चयन प्रक्रिया अब प्रमाणपत्रों की जांच को लेकर सवालों के घेरे में आती दिखाई दे रही है। विभिन्न गांवों में चयन प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े प्रमाणपत्रों की सत्यता और उनकी जांच के तरीके को लेकर आपत्तियां सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ मामलों में संदिग्ध अथवा कथित रूप से एडिट किए गए प्रमाणपत्रों के आधार पर भी अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि चयन स्थल पर ही प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता की जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है? यदि किसी अभ्यर्थी के दस्तावेज पर संदेह होता है तो उसकी जांच संबंधित बोर्ड, विश्वविद्यालय या प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था से तत्काल क्यों नहीं कराई जाती? आंगनबाड़ी सेविका का चयन सीधे तौर पर सरकारी व्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्र में महिला एवं बाल विकास से जुड़ी जिम्मेदारी से संबंधित है। इसलिए चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और दस्तावेजों की सत्यता बेहद महत्वपूर्ण है। एक गलत प्रमाणपत्र के आधार पर चयन होने से न केवल योग्य अभ्यर्थी का अधिकार प्रभावित हो सकता है, बल्कि पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा होता है।

डिजिलॉकर से सत्यापन क्यों नहीं?

आज के डिजिटल दौर में शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की सत्यता जांचने के लिए कई इलेक्ट्रॉनिक माध्यम उपलब्ध हैं। सवाल यह उठता है कि जहां संभव हो, वहां प्रमाणपत्रों का सत्यापन डिजिलॉकर अथवा संबंधित बोर्ड/विश्वविद्यालय के ऑनलाइन रिकॉर्ड से क्यों नहीं कराया जाता? डिजिलॉकर में उपलब्ध प्रमाणपत्रों को संबंधित संस्थाओं के डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ा जा सकता है। चयन स्थल पर अधिकारियों के पास यदि इंटरनेट, कंप्यूटर या मोबाइल आधारित सत्यापन की सुविधा उपलब्ध हो तो संदिग्ध दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच तत्काल की जा सकती है। इसके बाद अंतिम पुष्टि संबंधित प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था से कराई जा सकती है। पिछले दिनों डिजिलॉकर के माध्यम से प्रमाणपत्र जांच के दौरान एक अभ्यर्थी के पति द्वारा मोबाइल लेकर चले जाने की घटना भी सामने आया है। यदि यह घटना प्रमाणपत्र सत्यापन प्रक्रिया से संबंधित है तो इसकी भी निष्पक्ष जांच जरूरी है कि आखिर उस समय क्या हुआ, मोबाइल क्यों लेकर जाया गया और जांच प्रक्रिया पर इसका क्या प्रभाव पड़ा।

चयन के बाद महीनों तक नियुक्ति लंबित क्यों?

दूसरा गंभीर सवाल उन मामलों को लेकर है, जहां चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया लंबे समय तक लंबित रहने की बात सामने आ रही है। यदि चयन हो चुका है और दस्तावेजों की जांच पूरी होनी है, तो उसकी स्पष्ट समयसीमा क्या है? अभ्यर्थियों को महीनों तक इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? यदि किसी चयन पर आपत्ति या शिकायत प्राप्त होती है तो उसका निपटारा निर्धारित समय में होना चाहिए। शिकायत सही है तो कार्रवाई हो और गलत है तो अभ्यर्थी को नियुक्ति प्रक्रिया में आगे बढ़ाया जाए। लेकिन किसी मामले को अनिश्चित समय तक लंबित रखना न तो अभ्यर्थी के हित में है और न ही प्रशासनिक पारदर्शिता के लिहाज से उचित माना जा सकता है। इसी के साथ एक और गंभीर प्रश्न लोगों के बीच उठ रहा है कि क्या कहीं चयन प्रक्रिया में लेनदेन का खेल तो नहीं चल रहा? यह फिलहाल एक आरोप या आशंका है, जिसका कोई निष्कर्ष बिना जांच के नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यदि ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो प्रशासन को इसे नजरअंदाज करने के बजाय स्वतंत्र जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

आखिर ऐसे मामलों का कौन करेगा जांच?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रमाणपत्रों की कथित गड़बड़ी, चयन प्रक्रिया में अनियमितता और नियुक्ति में देरी की शिकायतों की जांच आखिर कौन करेगा? जिला प्रशासन चाहे तो चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में हुई चयन प्रक्रियाओं का नमूना आधार पर स्वतंत्र दस्तावेजी ऑडिट करा सकता है। संदिग्ध प्रमाणपत्रों को संबंधित बोर्ड, विश्वविद्यालय या प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था से सत्यापित कराया जा सकता है। साथ ही, चयन से संबंधित आवेदन, मेरिट सूची, प्रमाणपत्र सत्यापन रिपोर्ट और आपत्तियों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाना चाहिए। यदि किसी प्रमाणपत्र के साथ छेड़छाड़ या फर्जीवाड़ा साबित होता है तो संबंधित अभ्यर्थी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका प्रमाणपत्र सत्यापन में लापरवाही अथवा जानबूझकर अनियमितता की जांच में सामने आती है तो उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

उपायुक्त कार्यालय तक पहुंच रहा है विवाद

मामला अब उपायुक्त कार्यालय तक पहुंच रहा है, ऐसे में उम्मीद है कि जिला प्रशासन पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराएगा और यह स्पष्ट करेगा कि चयन प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई या नहीं। साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि संदिग्ध प्रमाणपत्रों की जांच के लिए क्या व्यवस्था है और चयन के बाद नियुक्ति लंबित रहने वाले मामलों का निपटारा कब तक किया जाएगा? आंगनबाड़ी सेविका चयन में किसी भी योग्य अभ्यर्थी के साथ अन्याय न हो और किसी अपात्र व्यक्ति को गलत दस्तावेज के आधार पर लाभ न मिले यही पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी कसौटी है। सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता, प्रमाणपत्रों की सत्यता और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का है।

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