संपादकीय: झारखंड को झारखंड और झारखंडियत समझने वाले अफसर चाहिए

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गुलाम रब्बानी : झारखंड केवल भारत का 28वां राज्य नहीं, बल्कि लंबे जनआंदोलन, संघर्ष, बलिदान और सांस्कृतिक अस्मिता का परिणाम है। इस राज्य की पहचान जल, जंगल, जमीन, आदिवासी-मूलवासी परंपराओं, भाषाई विविधता और प्रकृति के साथ उसके गहरे रिश्ते से बनती है। ऐसे राज्य में प्रशासन चलाने के लिए सिर्फ नियम-कानून की जानकारी काफी नहीं है, बल्कि झारखंड की आत्मा और झारखंडियत को समझने वाली सोच भी उतनी ही जरूरी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य में पदस्थापित हर अधिकारी चाहे वह पुलिस विभाग में हो, प्रशासनिक सेवा या किसी अन्य विभाग में हो, झारखंड को केवल अपनी पोस्टिंग का स्थान न समझे, बल्कि इसे अपनी जिम्मेदारी और सेवा का क्षेत्र माने। पुलिस की भूमिका सबसे अधिक जनसंपर्क वाली होती है। आम नागरिक सबसे पहले पुलिस से ही न्याय और सुरक्षा की उम्मीद करता है। इसलिए पुलिस अधिकारियों को कानून लागू करने के साथ-साथ स्थानीय समाज, परंपराओं और संवेदनशील मुद्दों की भी समझ होनी चाहिए। सख्ती तभी प्रभावी होती है, जब उसके साथ संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी जुड़ा हो।

इसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व केवल सरकारी योजनाओं की समीक्षा करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। स्वास्थ्य विभाग दूर-दराज़ गांवों तक इलाज पहुंचाए, शिक्षा विभाग हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाए, वन विभाग पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान करे, और बिजली-पानी सहित सभी विभाग जनता की मूलभूत जरूरतों को प्राथमिकता दें। झारखंड की सबसे बड़ी ताकत उसकी सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक एकता है। यहां रहने वाले हर समुदाय की अपनी परंपराएं, भाषाएं और जीवन शैली है। जब कोई अधिकारी इन विशेषताओं का सम्मान करता है, जनता से संवाद करता है और उनकी भावनाओं को समझकर निर्णय लेता है, तभी प्रशासन पर लोगों का भरोसा मजबूत होता है।

झारखंडियत का अर्थ किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं है। यह इस राज्य की साझा पहचान, संघर्ष की विरासत, प्रकृति के प्रति सम्मान, सामाजिक समरसता और जनभावनाओं का प्रतीक है। इसलिए यहां कार्यरत हर अधिकारी की प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि वह कानून के साथ न्याय करे, अधिकार के साथ संवेदनशीलता दिखाए और विकास के साथ विश्वास भी कायम रखे। झारखंड को ऐसे अफसरों की जरूरत है जो यहां की मिट्टी की खुशबू को महसूस करें, गांवों की धड़कन को समझें, लोगों की भाषा और भावनाओं का सम्मान करें तथा अपने पद को केवल अधिकार नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम मानें। क्योंकि अंततः किसी भी राज्य की पहचान केवल उसकी योजनाओं से नहीं, बल्कि उसके प्रशासन के व्यवहार और जनता के विश्वास से बनती है। झारखंड को ऐसे ही अफसर चाहिए जो सिर्फ झारखंड में तैनात न हों, बल्कि झारखंड को समझते भी हों।

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