मुफसील थाना और नगर थाना से सैकड़ों ट्रक निकलते हैं। चैकपोस्ट — जिनका नाम कानून की चौकी के रूप में दर्ज है — अब ‘पासपोस्ट’ बन चुके हैं। पियादापुर, चांदपुर, कुसमाफाटक — ये नाम मानो गूगल मैप पर मौजूद हैं, पर ज़मीन पर इन्हें मान्यता नहीं मिली। जिस ट्रक में गिट्टी हो, वो बस हॉर्न बजाए और निकल जाए। न कोई स्लिप, न कोई चालान, न कोई सवाल। जैसे किसी ने सायरन बंद कर दिया हो और कानून ने आँखें मूँद ली हों।
यहाँ प्रशासन का चेहरा भी अजीब है — मुफस्सिल थाना, नगर थाना, पाकुड़ के CO साहब, DMO, SDO और DTO — सबके नाम कागज़ों पर मौजूद हैं, मगर सड़कों पर उनकी आवाज़ गुम है। ट्रक निकलते हैं, धुआँ उड़ाते हैं, और साहब चुपचाप अपने काँच की खिड़कियों के पीछे बैठकर चाय में चीनी घोलते हैं। जनता पूछती है — क्या ये सब उनकी नज़रों से छिपता है या किसी कीमत पर अनदेखा कर दिया जाता है?
कई बार मामला सिर्फ एक ट्रक का नहीं रहता — यह प्रणाली बन चुकी है। छोटे-छोटे गांवों के रास्ते कटते हैं, खेतों के किनारे धूल का अम्बार जमा होता है, और लोगों की आवाज़ दब कर रह जाती है। सड़कें बिखरती हैं, हादसों की संख्याएँ बढ़ती हैं, और उस गिट्टी की कीमत के साथ एक और चीज़ बिक जाती है: इंसाफ का खामोश चेहरा। उसे भी एक मूल्य दे दिया गया है — अदृश्य, अनकही, पर महसूस किया हुआ।
किस्मत नहीं, ये चुनावों का मौसम नहीं — ये रोज़ की प्रकृति है। और रोज़ के सवालों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा है: जब तस्वीरें, जीपीएस और सबूत खुले हैं, तो जवाब क्यों नहीं? क्या सच्चाई की गणना भी किसी रेट पर होती है? क्या शासन-प्रशासन की चौकीदारी भी बाजार के भाव में बिकी हुई है?
यह कोई उपन्यास नहीं, यह हमारी सड़कों की रिपोर्ट है — हर हॉर्न में एक कहानी, हर धूल के बाद एक रोना। और जब जनता पूछती है, तो सवाल सिर्फ अधिकारियों की ओर नहीं जाता — वह उस समाज की ओर भी जाता है जो मान कर चल दिया है कि कुछ चीज़ों के खिलाफ आवाज़ उठाना मुश्किल है। पर आवाज़ उठती है — तस्वीरों में, जीपीएस में, लोगों की बड़बड़ाहट में। और जब आवाज़ मिलकर चीख बन जाती है, तब सिस्टम को जवाब देना होगा।
अंत में वही पुराना सवाल — कितनी कीमत है एक ट्रक गिट्टी की? अगर कीमत पैसे में न तो कितनी कीमत पर बिकता है इंसाफ का खामोश चेहरा? जवाब देना प्रशासन का काम है, और सावन के बाद भी अगर वही धूल रहेगा, वही हॉर्न रहेगा, वही अनदेखी रहेगी — तो जनता का भरोसा ही बिक चुका होगा। तब सवाल और तेज़ होंगे, और तस्वीरें खुद बोल उठेंगी: यहाँ कुछ गलत है — कोई सुनो, कोई करवा दो।









