खबर झारखंड: रक्षाबंधन केवल भाई और बहन के रिश्ते का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में अपनापन, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक है। यह एक ऐसा अवसर है, जब भाई-बहन का भावनात्मक जुड़ाव न केवल पारिवारिक, बल्कि सामाजिक मूल्यों को भी सशक्त करता है। रेशम का यह धागा भले ही नाजुक हो, लेकिन इसके भीतर जो प्रेम, सुरक्षा और जिम्मेदारी का वचन छुपा है, वह अटूट और स्थायी है।आज के बदलते समय में रक्षाबंधन का अर्थ केवल भाई द्वारा बहन को रक्षा का वचन देना भर नहीं रह गया है। अब यह बंधन समान अधिकार, आपसी सम्मान और जीवन भर साथ निभाने के संकल्प का प्रतीक बन चुका है। कई परिवारों में बहनें भी भाइयों को राखी बांधती हैं, और भाई-बहन एक-दूसरे की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं। यह बदलाव इस त्योहार को और भी प्रासंगिक बनाता है, क्योंकि सुरक्षा अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक रूप से भी आवश्यक है।
रक्षाबंधन हमें यह भी याद दिलाता है कि रिश्तों की सच्ची ताकत विश्वास, संवाद और सहयोग में होती है। जब समाज के लोग एक-दूसरे की भलाई के लिए खड़े होते हैं, तो वही भावना एक बड़े स्तर पर रक्षाबंधन की आत्मा को जीती है। आज जरूरत है कि हम इस पर्व की आत्मा को केवल व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे समाज और राष्ट्र के हर उस रिश्ते में उतारें, जहां सुरक्षा, समानता और स्नेह की आवश्यकता है। चाहे वह महिला सुरक्षा हो, बच्चों का संरक्षण हो या कमजोर वर्गों का उत्थान। हम सबको एक-दूसरे के “रक्षक” बनना होगा। रक्षाबंधन हमें यह सिखाता है कि धागा टूट सकता है, पर रिश्तों का विश्वास कभी नहीं टूटना चाहिए। यही विश्वास हमारे समाज को मजबूत और एकजुट रखता है। इस पावन पर्व पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने रिश्तों, मूल्यों और संस्कृति की रक्षा उतनी ही मजबूती से करेंगे, जितनी मजबूती से यह रेशम का धागा हमें जोड़े रखता है।









