संपादकीय: सरायकेला खरसावां जिला का स्थापना दिवस, बढ़ती उम्मीदों के बीच 25 साल का हिसाब

संपादकीय: सरायकेला खरसावां जिला का स्थापना दिवस, बढ़ती उम्मीदों के बीच 25 साल का हिसाब

इन्हे भी जरूर देखे

कुकड़ू: पांड्रा गांव में वज्रपात का कहर, खेत में काम कर रहीं दो महिलाओं की मौत, तीन झुलसी

सरायकेला: कुकड़ू प्रखंड अंतर्गत पांड्रा गांव में सोमवार दोपहर करीब 2 बजे वज्रपात की दर्दनाक घटना में खेत में धान की निकाई कर रहीं...

शिक्षक दिवस पर ज्ञान भंडार कोचिंग सेंटर सिरुम में मेधा सम्मान समारोह का आयोजन, विधायक सविता महतो ने मेधावी विद्यार्थियों को किया सम्मानित

सरायकेला। शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर शनिवार को कुकड़ू प्रखंड क्षेत्र के सिरुम स्थित ज्ञान भंडार कोचिंग सेंटर में शिक्षक दिवस विशेष कार्यक्रम...

खबर झारखंड डेस्क : सरायकेला-खरसावां जिला ने अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 4 अप्रैल 2001 को अधिसूचना जारी होने के बाद 30 अप्रैल को यह जिला अस्तित्व में आया था। एक चौथाई सदी का यह पड़ाव केवल सिल्वर जुबली का जश्न मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि ठहरकर यह आकलन करने का भी समय है कि इन वर्षों में हमने क्या पाया और किन मोर्चों पर अभी लंबा सफर बाकी है। जिला बनने के पीछे मूल उद्देश्य यही था कि प्रशासन आम लोगों के करीब पहुंचे और विकास की रफ्तार तेज हो। इस दिशा में बदलाव स्पष्ट रूप से दिखता है। जो इलाका कभी बड़े जिले के हाशिए पर था, वह अब अपनी अलग पहचान बना चुका है। प्रखंड और पंचायत स्तर तक योजनाओं की पहुंच बढ़ी है, सड़कों और बिजली की स्थिति में सुधार हुआ है और सरकारी तंत्र की सक्रियता भी पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है।

लेकिन विकास की यह तस्वीर पूरी तरह संतुलित नहीं है। आदित्यपुर और गम्हरिया जैसे औद्योगिक क्षेत्रों ने तेजी से प्रगति की है। यहां उद्योगों के कारण रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। इसके विपरीत कुचाई, ईचागढ़, नीमडीह, कुकड़ू और कई ग्रामीण क्षेत्रों तक यह विकास समान रूप से नहीं पहुंच पाया। गांव और शहर के बीच की खाई आज भी साफ नजर आती है। स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी यही असमानता दिखती है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन गंभीर या बेहतर इलाज के लिए लोगों को अब भी जमशेदपुर, रांची या अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है। एक सुसज्जित और मजबूत जिला अस्पताल की मांग लंबे समय से उठती रही है। शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों की संख्या बढ़ी जरूर है, लेकिन गुणवत्ता, संसाधन और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

सबसे अहम सवाल युवाओं का है। सीमित स्थानीय अवसरों के कारण बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार की तलाश में अन्य राज्य पलायन करना पड़ता है। औद्योगिक विकास के बावजूद स्थानीय स्तर पर व्यापक रोजगार सृजन अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है, जिससे उम्मीदों और हकीकत के बीच अंतर बना हुआ है। इन चुनौतियों के बीच जिले की सांस्कृतिक पहचान आज भी उसकी सबसे बड़ी ताकत है। छऊ नृत्य और स्थानीय परंपराएं समाज को जोड़कर रखती हैं और एक विशिष्ट पहचान देती हैं। इस विरासत को सहेजना उतना ही जरूरी है, जितना आधुनिक विकास को गति देना। 25 वर्षों का यह सफर उपलब्धियों और अधूरे सपनों दोनों की कहानी कहता है। अब समय है कि विकास का दायरा व्यापक हो, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच की दूरी कम की जाए और हर नागरिक तक समान अवसर और सुविधाएं पहुंचें। बढ़ती उम्मीदों के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सरायकेला-खरसावां अपने विकास को संतुलित और समावेशी बनाए। तभी यह सिल्वर जुबली केवल एक पड़ाव नहीं, बल्कि एक नए और बेहतर भविष्य की मजबूत शुरुआत बन सकेगी।

 

विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)

इन्हे भी जरूर देखे

कुकड़ू: पांड्रा गांव में वज्रपात का कहर, खेत में काम कर रहीं दो महिलाओं की मौत, तीन झुलसी

सरायकेला: कुकड़ू प्रखंड अंतर्गत पांड्रा गांव में सोमवार दोपहर करीब 2 बजे वज्रपात की दर्दनाक घटना में खेत में धान की निकाई कर रहीं...

शिक्षक दिवस पर ज्ञान भंडार कोचिंग सेंटर सिरुम में मेधा सम्मान समारोह का आयोजन, विधायक सविता महतो ने मेधावी विद्यार्थियों को किया सम्मानित

सरायकेला। शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर शनिवार को कुकड़ू प्रखंड क्षेत्र के सिरुम स्थित ज्ञान भंडार कोचिंग सेंटर में शिक्षक दिवस विशेष कार्यक्रम...

लांदुपडीह गांव में बारिश से रास्ते में गिरा घर

सोनाहातू : प्रखंड में मंगलवार को दिनभर हो रही बारिश से लांदुपडीह गांव में महाराज महतो का मिट्टी व खपरैल का कच्चा घर दोपहर...

Must Read