एक प्लॉट, दो मालिक! बिना रजिस्ट्री–बिना नोटिस कैसे बदल गया जमीन का मालिक? पाकुड़ अंचल की “कमाल” व्यवस्था पर बड़ा सवाल

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पाकुड़ जिले में जमीन अब हल और मेहनत से नहीं, बल्कि फाइल, फर्जीवाड़े और साठगांठ से जोती जा रही है। वर्षों से जिस जमीन पर रेयत खेती करते आ रहे हैं, वह जमीन बिना बिक्री, बिना रजिस्ट्री और बिना किसी कानूनी नोटिस के कथित तौर पर दूसरे के नाम चढ़ा दी गई। यह मामला सिर्फ जमीन विवाद नहीं, बल्कि अंचल कार्यालय में जमे भूमाफिया नेटवर्क की गंभीर तस्वीर पेश करता है।

मामला पाकुड़ सदर प्रखंड के चेंगाडांगा गांव का है, जहां सामसुल आलम और सामसुल रफीक (पिता– मरहूम सामसुल है) की जमीन को कागजों में नाजमुन नेहार बीबी, पति मो. जाकिर हुसैन, निवासी सीतापहाड़ी के नाम खरीदी हुई बताया जा रहा है। जबकि पीड़ितों का साफ कहना है कि न जमीन बेची गई, न पैसा लिया गया। कागजों में स्टांप, दस्तखत और रकम दर्ज है, लेकिन जमीन पर हकीकत बिल्कुल उलट है।

रेयतों का आरोप है कि वे दशकों से चास–आबाद कर रहे हैं, कर भी भरते रहे, लेकिन रातों-रात नामांतरण कर दिया गया। न नोटिस, न सुनवाई। सवाल यह है कि क्या पाकुड़ में कानून सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गया है?

आरोप है कि हल्का नंबर 9A और 9B में करीब 280 मोटेशन फाइलें लंबित हैं, लेकिन जिन फाइलों के साथ “लेन-देन” जुड़ा है, वे तेजी से पास हो जाती हैं। कहा जा रहा है कि हल्का कर्मचारी अजय दत्त के संरक्षण में मिनारूल और जोहरुल जैसे दलाल अंचल कार्यालय को अपनी जागीर समझ बैठे हैं और डिजिटल रिकॉर्ड तक से छेड़छाड़ कर रहे हैं।

मामला यहीं नहीं रुकता। इसाकपुर मौजा के प्लॉट नंबर 758 पर दो बार रजिस्ट्री और प्लॉट नंबर 1839 (तालाब दर्ज भूमि) का निजी नाम पर मोटेशन—यह सब किसी भूल का नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश का संकेत है।

राकेश भगत, अजय दत्त, देवाशीष सोरेन, सीताराम महतो, बिबेक तुरी, महेश और शंभू सोरेन (सीआई) पर मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। वहीं सागर गुप्ता, मोजफर शेख, जोहरुल शेख, मिनारूल शेख, अजारुल शेख और जॉय मंडल पर अंचल कर्मियों को प्रभाव में लेकर जमीन हेराफेरी का आरोप है।

अब सवाल सीधा है—

प्रशासन किसान के साथ खड़ा होगा या फर्जीवाड़े के साथ?

स्थानीय लोग उच्चस्तरीय, निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं, वरना पाकुड़ में किसी की जमीन सुरक्षित नहीं

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