पाकुड़ की धरती पर एक ऐसी कहानी चुपचाप सांस ले रही है, जिसे लोग जानते हैं, समझते हैं, लेकिन डर के कारण बोल नहीं पाते। इस कहानी का नायक खुद को समाजसेवी कहलवाता है। दिन में वह गरीबों के दुख पर आंसू बहाता है, मंचों से न्याय, विकास और हक़ की बातें करता है। लोग तालियां बजाते हैं, फूल चढ़ाते हैं और उसे मसीहा मान लेते हैं।
लेकिन रात होते ही वही चेहरा बदल जाता है। तब वह समाजसेवी नहीं रहता—वह डर बन जाता है। कोई उसे पत्थर माफिया कहता है, कोई जमीन माफिया, और कुछ लोग तो यह भी तय नहीं कर पाते कि वह आखिर है क्या। बस इतना जानते हैं कि उसके अवैध काम खुलेआम चलते हैं और उन्हें रोकने की हिम्मत किसी में नहीं बची। कोई अगर सवाल उठाने की कोशिश करे, तो उसे समझा दिया जाता है—खामोश रहो, यही भलाई है।
कभी-कभी कोई गरीब ग्रामीण हिम्मत जुटाकर छोटी-सी बात पर विरोध कर देता है। तभी समाजसेवा का मुखौटा टूट जाता है। हाथ में देशी कट्टा लहराता है, हवा में गोलियां गूंजती हैं और गांव का आकाश कांप उठता है। बच्चे सहम जाते हैं, महिलाएं दरवाजे बंद कर लेती हैं और बूढ़ों की आंखों में बेबसी उतर आती है। यह कहानी सिर्फ एक आदमी की नहीं, पूरे सिस्टम की चुप्पी की है। जहां डर जीतता है, इंसाफ हार जाता है और समाजसेवा का नाम लेकर समाज को ही जख्मी कर दिया जाता है। यही पाकुड़ की वह दुख भरी कहानी है, जो हर दिन दोहराई जाती है—बिना किसी अंत के।









