कुड़मी-आदिवासी विवाद नहीं, झारखंड की एकजुटता ज़रूरी है : गुलाम रब्बानी

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झारखंड की पहचान उसकी विविधता, संस्कृति और संघर्ष की विरासत से है। यहाँ हर समुदाय ने अपनी मेहनत, परंपरा और बलिदान से इस मिट्टी को संजोया है। लेकिन आज राज्य के भीतर कुड़मी समाज और आदिवासी समाज के बीच जो टकराव देखने को मिल रहा है, वह झारखंड की आत्मा को कमजोर कर रहा है। कुड़मी समाज स्वयं को आदिवासी सूची में शामिल करवाने की मांग कर रहा है, जबकि आदिवासी समाज इसका विरोध कर रहा है। दोनों ओर तर्क हैं, भावनाएं हैं, इतिहास की व्याख्याएं हैं। लेकिन इन सबके बीच असली नुकसान झारखंड के आम लोगों का हो रहा है। जब हम आपस में विभाजित होते हैं, तब हमारी एकता और ताकत दोनों कमज़ोर पड़ती हैं।

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन आदिवासी है या नहीं। बल्कि यह होना चाहिए कि झारखंड के लोगों का हक़ आखिर कब मिलेगा? 15 नवंबर 2000 को आदिवासियों और मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से झारखंड राज्य अस्तित्व में आया। लेकिन आज, 25 साल बाद भी राज्य में कोई स्पष्ट स्थानीय नीति या नियोजन नीति नहीं है। सरकारी नौकरियों में झारखंड के युवाओं की भागीदारी लगातार घट रही है। थर्ड और फोर्थ ग्रेड की नौकरियों में भी बाहरी लोगों का वर्चस्व बढ़ रहा है। यह स्थिति तब है जब झारखंड के युवाओं में प्रतिभा और मेहनत की कोई कमी नहीं है।

इसलिए आज ज़रूरत है कि कुड़मी और आदिवासी… दोनों अपने मतभेदों को किनारे रखकर एकजुट हों। झारखंड की असली लड़ाई पहचान की नहीं, अधिकार की है। अगर हम सच में इस धरती से प्यार करते हैं, तो हमें एक साथ मिलकर झारखंड के लिए स्थानीय नीति और नियोजन नीति की माँग करनी चाहिए, ताकि इस राज्य की नौकरियां संसाधन और अवसर झारखंड के ही लोगों को मिलें। कुड़मी बनाम आदिवासी की बहस से ऊपर उठकर, झारखंड बनाम अन्याय की लड़ाई लड़नी होगी। यही सच्ची झारखंडियत है

गुलाम रब्बानी, पत्रकार

(नोट: यह लेख केवल झारखंड के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है।)

 

 

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