खबर झारखंड डेस्क : भारत की सभ्यता और संस्कृति की पहचान अहिंसा, सहिष्णुता और सत्य की राह से रही है। महात्मा गांधी ने इस पहचान को और मजबूत किया। उन्होंने दुनिया को यह दिखाया कि बिना हथियार उठाए भी साम्राज्यवादी ताक़तों को झुकाया जा सकता है। लेकिन दुखद विडंबना है कि इसी देश में गांधी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे पैदा हुआ। जिसे इतिहास भारत का पहला आतंकवादी कहे बिना नहीं रह सकता।
गोडसे ने गांधी की हत्या करके न सिर्फ़ एक महात्मा को मारा, बल्कि भारत की आत्मा पर भी वार किया। यह हत्या महज़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचार की थी जो भारत को जोड़ता था- अहिंसा और सत्य का विचार। जिस राष्ट्रपिता ने हमें आज़ादी दिलाई, उन्हें गोलियों से छलनी कर देना एक कायराना हरकत थी, आतंक का वह चेहरा जो नफरत की राजनीति से जन्मा।
आज सबसे बड़ा खतरा यह है कि कुछ समूह गोडसे का महिमामंडन करने में लगे हैं। उसकी तस्वीरों पर फूल चढ़ाए जाते हैं, उसे “देशभक्त” कहा जाता है। सवाल यह है कि क्या किसी क़ातिल को, जिसने लोकतंत्र और इंसानियत की हत्या की, इस तरह गौरव देने का प्रयास सही है? अगर गोडसे जैसा व्यक्ति नायक बनेगा तो यह हमारे बच्चों के लिए कैसा संदेश होगा?
गांधी का रास्ता कठिन था, लेकिन उन्होंने हमें दिखाया कि सच्ची ताक़त विचारों में होती है, बंदूक़ की नाल में नहीं। उन्होंने विभाजित भारत को जोड़ने का प्रयास किया, हर धर्म, हर वर्ग को बराबरी का हक़ दिलाने की लड़ाई लड़ी। गोडसे इस समावेशी भारत के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ और आतंक के रास्ते को चुना। आज हमें यह साफ़ करना होगा कि भारत गांधी का है या गोडसे का। क्या हम वह राष्ट्र बनना चाहते हैं जो प्रेम, शांति और सहिष्णुता से दुनिया को राह दिखाए, या वह राष्ट्र जो अपने ही नायक की हत्या करने वाले की पूजा करे?
भारत की आत्मा गांधी में बसती है, गोडसे में नहीं। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि नफरत नहीं, बल्कि करुणा ही सभ्यता का असली आधार है। आतंकवादी चाहे किसी भी विचारधारा से निकले, वह कभी देशभक्त नहीं हो सकता। नाथूराम गोडसे का नाम हमेशा इतिहास में एक आतंकवादी के रूप में ही याद किया जाएगा और गांधी का नाम एक महात्मा के रूप में। यही अंतर आने वाली पीढ़ियों तक स्पष्ट रहना चाहिए।









