खबर झारखंड डेस्क : भारत की आत्मा अहिंसा और सत्य के उन मूल्यों से निर्मित हुई है, जिनका सबसे बड़ा प्रतीक महात्मा गांधी थे। वहीं इस देश की सांस्कृतिक धरोहर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की आदर्श जीवनगाथा है। लेकिन आज विडंबना यह है कि उसी भारत में, जहां गांधी ने अहिंसा को शस्त्र बनाया और राम ने धर्म व मर्यादा का मार्ग दिखाया, वहां गोडसे का महिमामंडन और रावण का गुणगान होने लगा है।
गांधी का हत्यारा गोडसे, जिसने अहिंसा के पुजारी को गोलियों से छलनी किया, आज कुछ समूहों द्वारा “देशभक्त” बताकर महिमामंडित किया जा रहा है। यह केवल इतिहास से खिलवाड़ नहीं, बल्कि उस आत्मा पर आघात है जिसने भारत को स्वतंत्रता दिलाई। यदि हत्या और हिंसा को वैचारिक साहस माना जाने लगे तो यह हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करेगा।
इसी तरह राम की धरती पर रावण की प्रशंसा एक विरोधाभास है। रावण के ज्ञान और सामर्थ्य से इनकार नहीं, परंतु उसकी असुरता, अहंकार और स्त्री के अपमान ने ही उसके विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। राम केवल राजा नहीं थे, वे त्याग, करुणा और न्याय के प्रतीक थे। उनकी मर्यादा ही भारत की पहचान है। ऐसे में रावण का गुणगान करना कहीं न कहीं समाज में नैतिक मूल्यों के संकट की ओर इशारा करता है।
भारत की महानता इस बात में रही है कि यहां असहमति का भी सम्मान किया गया, लेकिन असहमति का अर्थ इतिहास के हत्यारों और अत्याचारियों को आदर्श बनाना नहीं हो सकता। गांधी और राम हमारे लिए केवल ऐतिहासिक या धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि नैतिक मार्गदर्शक हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी नई पीढ़ी को बताएं कि असली ताक़त गोलियों में नहीं, बल्कि विचारों में है। असली महानता सत्ता या बल प्रयोग में नहीं, बल्कि मर्यादा और करुणा में है। गांधी और राम को भुलाकर यदि हम गोडसे और रावण को आदर्श बनाने लगेंगे तो यह देश की आत्मा को खोखला कर देगा।
गांधी और राम का भारत तभी सशक्त होगा जब हम उनके दिखाए मार्ग- सत्य, अहिंसा, मर्यादा और न्याय को जीवन में उतारें। यही हमारे लोकतंत्र की असली सुरक्षा और भविष्य की गारंटी है।









