पाकुड़ की विडंबना: रॉयल्टी करोड़ों में, रोज़गार जीरो… पलायन बना मजबूरी

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करोड़ों की रॉयल्टी देने वाला जिला, फिर भी रोज़गार के लिए मज़दूरी को मजबूर युवा

पाकुड़ (सुबल यदुवंशी)। संसाधनों से समृद्ध और पत्थर खनन की राजधानी कहलाने वाला पाकुड़ जिला आज पलायन और बेरोज़गारी की भयावह तस्वीर पेश कर रहा है। यहाँ से हर साल खनन और रॉयल्टी के नाम पर सरकार की तिजोरी करोड़ों रुपये से भरती है, लेकिन उसी ज़िले के युवा आज अपने गाँव-घर छोड़कर दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में मज़दूरी करने के लिए मजबूर हैं।

पाकुड़ रेलवे स्टेशन इस विडंबना का जीवंत उदाहरण है। हर दिन दर्जनों ट्रेनें यहाँ से गुजरती हैं और हर बार प्लेटफॉर्म पर युवाओं, महिलाओं और बच्चों की भीड़ दिखाई देती है। यह भीड़ रोज़गार की तलाश में अपने गाँव और खेत छोड़कर दूर-दराज़ शहरों की ओर रुख करती है। कई परिवार तो पूरे-के-पूरे अपने बच्चों के साथ महानगरों में अस्थायी झोपड़ियों में बसने को मजबूर हैं।

झारखंड आंदोलन की नींव, लेकिन हालात बदतर

पाकुड़ का बड़ा हिस्सा आदिम जनजातीय समुदायों का है। यही समुदाय झारखंड आंदोलन की ताकत रहा और अलग राज्य की पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष किया। लेकिन आज, इन्हीं आदिवासियों को रोजगार के अभाव में दर-दर भटकना पड़ रहा है। युवाओं का कहना है कि झारखंड राज्य तो हमारे पेट भरने और सम्मान दिलाने के लिए बना था, लेकिन आज भी हम पलायन करने को मजबूर हैं।

योजनाएँ काग़ज़ों तक सीमित

ग्रामीण बताते हैं कि मनरेगा जैसी योजनाएँ सिर्फ फाइलों और कागज़ों में सीमित हैं। काम समय पर नहीं मिलता, मजदूरी महीनों तक अटकी रहती है। वहीं, जिले में दर्जनों पत्थर खदानें और क्रशर यूनिट होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को रोजगार का अवसर नहीं दिया जाता। ठेकेदार और कंपनियाँ बाहरी मज़दूरों को तरजीह देती हैं और स्थानीय युवाओं को बेरोज़गार छोड़ देती हैं।

विस्थापन और कंपनियों का खेल

पाकुड़ जिले में सक्रिय BGR और DBL जैसी बड़ी कंपनियाँ भी विस्थापन और रोजगार विवादों से घिरी रहती हैं। आए दिन विस्थापित परिवार मुआवज़े और रोजगार की मांग को लेकर आवाज़ उठाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन कंपनियों में भी ज़्यादातर नौकरियाँ बाहर से आए लोगों को दी जाती हैं और स्थानीय आदिवासी युवाओं को मजबूर होकर पलायन करना पड़ता है।

सवालों के घेरे में जिला प्रशासन

स्थिति यह है कि खनन रॉयल्टी का करोड़ों रुपया सरकार की तिजोरी में जाता है, लेकिन पाकुड़ के युवाओं के लिए रोजगार और विकास के नाम पर कुछ नहीं आता। न सड़कें सुधर रही हैं, न स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहतर हो रही हैं, न ही शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान विकसित हो रहे हैं।

स्थानीय बुद्धिजीवी और सामाजिक संगठनों का सवाल है कि आख़िर ज़िले की रॉयल्टी से मिलने वाला पैसा कहाँ जाता है? क्यों पाकुड़ के हिस्से में केवल धूल, धुआँ और बेरोज़गारी आती है, जबकि बाकी राज्य इसका फायदा उठाता है?

गाँवों के वीरान होने का खतरा

ग्रामीण युवाओं ने चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले समय में पाकुड़ पूरी तरह से पलायन की मार झेलने लगेगा। गाँव वीरान हो जाएँगे और यहाँ केवल बुजुर्ग और बच्चे ही बचेंगे।

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