खबर झारखंड: हर साल 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस केवल एक तिथि भर नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों आदिवासी भाइयों-बहनों की अस्मिता, संस्कृति और संघर्ष को सम्मान देने का दिन है, जिन्होंने सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जिया और मानव सभ्यता को अनगिनत विरासतें दीं। यह दिन हमें उनकी गौरवशाली परंपराओं को याद करने के साथ-साथ यह सोचने का भी अवसर देता है कि हम उनकी समस्याओं, अधिकारों और अस्तित्व के लिए क्या कर रहे हैं। आदिवासी समाज की पहचान उसकी विविध संस्कृति, लोककला, भाषा, रीति-रिवाज और प्रकृति से गहरे जुड़ाव में निहित है। उनकी जीवनशैली में पर्यावरण संरक्षण, सामूहिकता और साझेदारी के वे मूल्य हैं, जिनकी सीख आज की दुनिया को बेहद ज़रूरत है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस समाज ने हमें प्रकृति से जुड़कर जीना सिखाया, वही समाज आज विस्थापन, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य संकट और अधिकारों के हनन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।
विश्व आदिवासी दिवस हमें याद दिलाता है कि विकास केवल सड़कों, इमारतों और उद्योगों से नहीं मापा जा सकता। असली विकास तब होगा जब आदिवासी समाज अपनी संस्कृति और अधिकारों को बचाए रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसरों में बराबरी पाएगा। यह जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। आज आवश्यकता है कि हम आदिवासी समाज को “कल्याण के विषय” के रूप में नहीं, बल्कि “विकास के सहभागी” के रूप में देखें। उनकी पारंपरिक ज्ञान-व्यवस्था, कृषि पद्धतियाँ, वन प्रबंधन और हस्तशिल्प को मुख्यधारा में लाकर हम न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी समृद्ध बना सकते हैं। इस विश्व आदिवासी दिवस पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि आदिवासी समाज के अधिकार, अस्तित्व और संस्कृति की रक्षा करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। क्योंकि किसी भी देश की ताकत उसकी विविधता और समावेशिता में होती है, और भारत की आत्मा उसकी आदिवासी जड़ों में गहराई से धड़कती है।









