संपादकीय: KYC का फंदा और आधार की बेड़ियां, क्या न्यू इंडिया की यहीं पहचान?

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एक लोकतांत्रिक देश में नागरिक का अधिकार होता है कि वह बिना अनावश्यक अड़चनों के अपने जीवन के कार्यों को पूरा कर सके। लेकिन भारत में बीते ग्यारह वर्षों से नागरिकों को बार-बार अपनी ही पहचान साबित करने के चक्रव्यूह में फँसाया गया है।

KYC यानी “Know Your Customer” एक शब्द जो अब भारतीयों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। बैंक हो, मोबाइल नेटवर्क, गैस एजेंसी, पेंशन योजना, सब्सिडी या फिर कोई और सरकारी सुविधा, हर जगह एक ही सवाल पूछा जाता है – KYC किया है या नहीं?

और इस सवाल का उत्तर चाहे आपने जितनी भी बार दिया हो, सिस्टम का अगला सवाल तैयार रहता है- फिर से अपडेट करिए वरना सेवा बंद।

आधार: पहचान या परीक्षा?

जब आधार कार्ड बना था तो कहा गया था अब आपको बार-बार दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन विडंबना देखिए अब आधार ही हर कागज़ की माँग करवाता है। आपका मोबाइल नंबर आधार से लिंक नहीं? सिम बंद।
बैंक में KYC अपडेट नहीं? खाता फ्रीज।
पेंशनर ने बायोमेट्रिक नहीं दिया? पेंशन रोकी जाएगी। क्या यह डिजिटल सुविधा है, या तकनीकी आतंक?

2014 से 2025 तक- एक दशक से ज़्यादा समय बीत गया। देश डिजिटल हुआ, मोबाइल पेमेंट से लेकर UPI तक में आगे बढ़ा, लेकिन नागरिक सिर्फ़ अपनी पहचान साबित करते-करते ही थक गए।

ग़ालिब की एक पंक्ति याद आती है- ग़ालिब, हमें तो अपने होने का यक़ीं नहीं आता। आज हर भारतीय कह सकता है- हमें तो अपने ही KYC पर यक़ीन नहीं आता।

सवाल सरकार से क्या सरकार को नहीं लगता कि बार-बार एक ही नागरिक से उसकी पहचान मांगना, नागरिक की गरिमा को ठेस पहुँचाना है? क्या आधार और बायोमेट्रिक की सारी बातें सिर्फ़ प्रचार तक सीमित थीं? क्या डिजिटल इंडिया का सपना, “KYC इंडिया” तक ही सिमट कर रह गया है?
देश को ज़रूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जिसमें नागरिकों को एक ही बार पहचान साबित करनी पड़े और वो पहचान पूरे जीवन भर, हर सेवा में मान्य हो।
बायोमेट्रिक, फेस रिकग्निशन, OTP, ये सब अगर वाकई आधुनिक तकनीकें हैं, तो बार-बार पहचान मांगने की ज़रूरत क्यों?
एक राष्ट्र, एक पहचान, एक प्रक्रिया, यही होना चाहिए डिजिटल भारत का आधार।
अन्यथा हम तकनीक का उत्सव नहीं मना रहे, बल्कि पहचान का शोकगीत गा रहे हैं।
सत्ता को यह समझना होगा कि नागरिक का समय, श्रम और गरिमा, सबका मूल्य है। हर बार KYC माँगकर नागरिक पर भरोसा नहीं जताया जाता, बल्कि उसपर शक की छाया डाली जाती है। अब वक्त है… आधार से आगे बढ़ने का।

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